Showing posts with label लेख. Show all posts
Showing posts with label लेख. Show all posts

Tuesday, June 7, 2016

जहाँ शरीर का सुख अर्थ है वहाँ आत्मा का सुख परमार्थ है।

ऐसे मनुष्यों का सर्वथा अभाव नहीं है कि जिन्होंने अपनी पहुँच, पुरुषार्थ, प्रयत्न एवं प्रारब्ध तक साँसारिक सुख जैसे स्वास्थ्य सुख; सन्तान-सुख; सामाजिक एवं पारिवारिक सुख, न प्राप्त कर लिया हो। अनेकों ऐसे व्यक्ति मिलेंगे जिन्हें कोई विशेष दुःख न हो और किसी हद तक उन्हें सुखी ही कहा जा सकता है।
किन्तु ऐसे सुखियों से भी यदि सच्चाई के साथ बतलाने का अनुरोध किया जाये तो निश्चय ही वे यही कहेंगे कि उन्हें कोई दुःख तो अवश्य नहीं है, फिर भी इस सुख में एक अभाव, एक अतृप्ति खटकती रहती है। कुछ ऐसा अनुभव होता रहता है जैसे हमें वह सुख, वह तृप्ति नहीं मिल रही है जो मिलनी चाहिये और मिल भी सकती है। इस अभाव, इस खटक और इस अतृप्ति का कारण खोजने में पर भी नहीं मिलता है।
निःसन्देह इस प्रकार की अतृप्ति बड़े से बड़े सुखी व्यक्ति में रहा करती है। यह अभाव, यह अतृप्ति उसकी आत्मा की माँग होती है जो पूरी नहीं की जाती है। संसार के सारे सुख इन्द्रिय-जन्य शारीरिक ही होते हैं। शरीर का अंश न होने से आत्मा की तृप्ति उस से नहीं होती। आत्मा की यही अतृप्ति सुखी व्यक्ति को भी अभाव बनकर खटकती रहती है।
जहाँ शरीर का सुख अर्थ है वहाँ आत्मा का सुख परमार्थ है। जब तक परमार्थ द्वारा आत्मा को संतुष्ट न किया जायेगा, उसकी माँग पूरी न की जायेगी तब तक सर्व सुखों के बीच भी मनुष्य को एक अभाव एक अतृप्ति व्यग्र करती ही रहेगी। शरीर अथवा मन को, संतुष्ट कर लेना भर ही वास्तव में सुख नहीं है। वास्तविक सुख है—आत्मा का संतुष्ट करना, उसे प्रसन्न करना।
साँसारिक भोग भोगने और मनभाई परिस्थितियाँ पा लेने से शारीरिक सुख मिलता है, किन्तु आत्मा सुखी होती है—परोपकार एवं पर सेवा रूपी परमार्थ कार्यों से। अतएव विवेकशील व्यक्ति सच्चा सुख पाने के लिये स्वार्थ सुख की अपेक्षा परमार्थ सुख को अधिक महत्व देते हैं। वे परमार्थ सुख के लिये स्वार्थ सुख का भी त्याग कर देते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि शारीरिक सुख छाया है और आत्मिक सुख सत्य है, यथार्थ है। जिसके प्रति हमारी इतनी जिज्ञासा है, इतना आकर्षण है उसके बिम्ब को क्यों प्राप्त किया जाये, क्यों न चन्द्रमा की ही उपलब्धि की जाये।
मीरजाफर द्वारा विश्वासघात—
सन् 1757 की बात है—अंग्रेज बंगाल पर अपना कब्जा करने का प्रयत्न कर रहे थे। किन्तु नवाब सिराजुद्दौला की नीतिमयी वीरता से उनकी दाल न गलती थी। बार-बार मुँह की खाने पर अंग्रेजों ने कूटनीति से काम लिया। उन्होंने सिराजुद्दौला के सेनापति मीरजाफर पर डोरे डालने शुरू किये। उन्हें पता लग गया कि मीरजाफर एक कुशल सेनापति होते हुये भी बड़ा लालची और कमजर्फ आदमी है। अंग्रेजों ने उसका लाभ उठाया और उसे बंगाल का नवाब बना देने का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। मीरजाफर नवाबी का स्वप्न देखता हुआ बड़ा खुश रहने लगा।
इधर अंग्रेजों ने नई तैयारी करके बंगाल पर फिर आक्रमण किया। सिराजुद्दौला ने सेनापति मीरजाफर को मोर्चे पर भेजा। नवाब के मन बढ़े सिपाही बड़ी वीरता से लड़े किन्तु गद्दार मीरजाफर ने उन्हें हतोत्साहित करके अस्त-व्यस्त कर दिया। अंग्रेजों की जीत हो गई जिसके फलस्वरूप बंगाल पर उनका अधिकार हो गया।
मीरजाफर ने जब अपना वचन पूरा करने को कहा—तो अंग्रेज सेनापति ने घृणा से यह कहकर उसे तलवार के घाट उतार दिया—”कि ऐ विश्वास घाती कुत्ते! तू बंगाल का सुलतान होने का स्वप्न देख रहा है। तेरे जैसे गद्दार को दुनिया में जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है। जब तू अपने मालिक और मुल्क का न हुआ, तो हमारा ही क्या होगा?”
परोपकार अथवा पर-सेवा ही परमार्थ का सच्चा एवं सक्रिय स्वरूप है। योग, ध्यान, साधना अथवा आराधना की अपेक्षा आत्मिक सुख के मार्ग परमार्थ की ओर बढ़ने के लिये—’सेवा’ सबसे सरल साधन एवं उपाय है।
सेवा संसार में सबसे बड़ा परमार्थ है। इसमें मानव जीवन की महती मान्यताओं का मूल्याँकन रहता है। सेवा द्वारा किसी दूसरे को सुखी बनाने में जो आत्मतोष होता है, उसकी तुलना में शारीरिक सुख तुच्छ एवं नगण्य है। दूरदर्शी व्यक्ति जानते हैं कि परोपकार से मनुष्य का न केवल लोक ही सुधरता है अपितु परलोक भी बनता है। संसार यात्रा के समय जो जिस मात्रा में अपनी आत्मा को प्रसन्न एवं उन्नत बना लेगा, महाभियान के समय वह उतने ही उच्च लोकों का अधिकारी बनेगा। इस प्रकार की अहैतुक प्रसन्नता आत्मा को यदि मिल सकती है तो केवल परोपकार रूपी परमार्थ से। जो परोपकार अथवा परसेवा का कोई व्यावहारिक सत्कर्म न करके आत्मतोष के लिये तप अथवा योग साधन मात्र करते रहते हैं, वे भी एक प्रकार के स्वार्थी ही होते हैं। भले ही उनका वह स्वार्थ तुच्छ, हेय अथवा निकृष्ट न कहा जाये। हाँ, यह आध्यात्मिक स्वार्थ तब अवश्य ही परमार्थ बन सकता है जब यह पर-सेवा अथवा परोपकार के लिये ही किया जाये। यदि तप द्वारा प्राप्त होने वाले आत्म संयम, आत्मशक्ति अथवा आत्मरोध का उद्देश्य यह हो कि हम इस प्रकार एक सच्चे सेवक की पवित्रता प्राप्त करके जन-सेवा, लोक सेवा अथवा परोपकार कार्य में ही संलग्न होंगे तब तो वह तप श्लाघ्य होगा अन्यथा वह भी जायेगा स्वार्थ की परिधि में ही।
आध्यात्मिक उद्योग अथवा परमार्थ साधना का प्रतिफल क्या है —आत्म-बोध। आत्म-बोध, आत्मतोष, आत्म प्रसाद अथवा आत्म सुख। सेवा के सत्कर्म करने पर इस सुफल की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। आज ही कोई छोटा-सा सेवा कार्य की याद कर देखिये—आप पायेंगे कि उक्त छोटे सेवा कार्य में जितनी आत्म प्रसन्नता, आत्म संतोष प्राप्त हुआ है उतना सप्ताह भर की पूजा उपासना अथवा तपश्चर्या में भी नहीं प्राप्त हुआ। यह यथार्थ तथा व्यक्तिगत अनुभव कोई भी बड़ा-छोटा व्यक्ति स्वयं ही करके निर्णय कर सकता है कि परोपकार तथा सेवा सत्कार्य सद्य फल-दाता होते हैं। तब ऐसे सद्य-फल-दाता सेवा तप को छोड़कर मनः-मार्गीय उस तपश्चर्या में समय क्यों दिया जाये, जिसका कि प्रतिफल निश्चित नहीं होता।
स्थैर्य तप के नियम नितान्त वैज्ञानिक एवं विलक्षण हैं। यह तलवार की धार से भी अधिक तीक्ष्ण तथा मृणाल-तन्तु से भी अधिक कोमल होते हैं। एक तो इनका सम्पूर्ण निर्वाह ही कठिन है दूसरे यदि इनका निर्वाह भी किये जाने का प्रयत्न किया जाये तो यह तनिक सी मानसिक छलन से टूट जाते हैं। एक लम्बे समय की साधना क्षण मात्र में भंग हो जाती है। वर्षों के साधे हुये संकल्प चारित्रिक विकल्प से नष्ट हो जाते हैं और तब बहुधा साधक को पुनः ‘अ’ ‘आ’ से यात्रा प्रारम्भ करनी पड़ती है। इस प्रकार के संकल्प-विकल्पों का क्रम न जाने कब तक चलता रहता है। यह मनः मार्गीय अध्यात्म साधना जन्म जन्मान्तरों तक की अवधि ले सकती है। सेवा मार्ग से जिस मनःशाँति के लिये मनुष्य को एक जीवन ही काफी है उसके लिये हठ पूर्वक जन्म जन्मान्तरों का मूल्य चुकाना महंगा ही कहा जायेगा। वैसे जो सामर्थ्यवान हैं वे चुकाते भी हैं और एक लम्बी यात्रा का श्रम करके अपना लक्ष्य प्राप्त भी कर लेते हैं। किन्तु जनसामान्य के लिये यह व्यवहार-सम्मत कहा जाना उपयुक्त नहीं जान पड़ता। मन बड़ा दुराग्रही, चंचल तथा बलवान है। यह बिना रज्जु-संयोजन अथवा योजना के यों ही शून्य में पकड़ने से वश में नहीं आता। इसको वश में लाने, अनुद्धत राहगीर बनाने के लिये परोपकार पथ पर जोतना ही होगा—इसे सत्कर्मों में नियोजित करना ही होगा—इसे सेवा की कठोर लगाम देनी ही होगी। सेवा के सत्कर्म में नियोजित मन को इधर उधर भागने का अवकाश ही नहीं मिलता। सेवा कार्य के साथ सम्बंधित दया, करुणा, सहानुभूति तथा आत्मीयता आदि इतने शीतल गुण होते हैं कि इनके स्पर्श सुख से मन स्वयं ही एकाग्र होने लगता है और इस प्रकार धीरे-धीरे शिव संकल्पी स्वाधीन मन स्वतः ही निर्मल होकर आत्मा को एक स्थायी सुख, एक अक्षय प्रसन्नता प्रदान करता है। यही है परमार्थ और यही है मनुष्य का साध्य, जो कि परोपकार तथा सेवा भाव से सहज ही पाया जा सकता है।
इसके अतिरिक्त स्वयं भी ठीक-ठीक नैतिक नागरिक तथा आचरणवान बनना, अपनी विकृतियों, विकार तथा असभ्यता को दूर करके सभ्य, शिष्ट तथा अनुशासित बनना भी एक परोपकार ही है। क्योंकि ऐसा बनने से आप समाज में एक सभ्य नागरिक बनेंगे, अपने संतुलित व्यवहार से दूसरों को शीतल एवं प्रसन्न करेंगे और अपने उदाहरण से दूसरों को सभ्य, शिष्ट तथा सदाचारी बनने की प्रेरणा देंगे। अपने अधिकार तथा कर्तव्यों को ठीक-ठीक समझना और उनका सुधारना सामाजिक ही नहीं सार्वदेशिक सत्कर्म है। इस प्रकार के अन्य न जाने कितने छोटे-छोटे सेवा कार्य हो सकते हैं जिनको सामान्य से सामान्यजन भी प्रतिपादित करके परमार्थ लाभ कर सकता है। दिन भर की व्यस्त जिन्दगी में किया हुआ एक छोटा-सा सेवा कार्य उस दिन को स्वर्गीय सुख-संतोष से भर देगा। उस दिन की कोई भी निराशा, असफलता अथवा विषाद जैसी तीव्र स्थिति आपको व्यग्र अथवा त्रस्त नहीं रख सकती। इस प्रकार आप बिना किसी विशेष श्रम के प्रतिदिन एक छोटा-सा सेवा कार्य करके अपनी पूरी जिन्दगी को हर्ष, उल्लास, सुख और संतोष को आगार बना सकते हैं जो कि आपको एक स्थायी आत्मिक सुख देने में सर्वथा समर्थ होगी। जब साधारण से साधारण जन इस प्रकार निःस्वार्थ सेवा से परमार्थ लाभ कर सकता है, तब धनी मानी तथा साधन सम्पन्न व्यक्ति तो न जाने क्या क्या कर सकते हैं। और यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने प्रत्येक कार्य को राष्ट्र, समाज, संसार अथवा ईश्वर का सेवा कार्य समझकर करने लगे तब तो यह संसार ही स्वर्ग बन जाये। न शारीरिक सुख का अभाव रहे और न आत्मिक सुख का अभाव खटके। मनुष्य सम्पूर्ण रूप से सुखी तथा संतुष्ट हो जाये।
सेवा कार्यों में एक बात का विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता यह है कि जो भी सेवा की जाये वह सत्पात्र की ही की जाये। अपात्र की सेवा पुण्य के स्थान पर पाप वाहिका ही सिद्ध होगी। न जाने कितने वंचक, अपंग, अन्ध आवश्यकता ग्रस्त समाज में भोले, भले और परोपकारी व्यक्तियों की दया, करुणा तथा सहानुभूति ठगने के साथ अपना आर्थिक उल्लू भी सीधा करते घूमते हैं। ऐसे वंचकों की सेवा अथवा सहायता करने से एक तो बेचारे अधिकारी पात्र वंचित रह जायेंगे दूसरे यह ठग और वंचक समाज में बिना श्रम के जीते हुये विकृतियाँ उत्पन्न करेंगे। सस्ती अथवा अनियंत्रित सहायता सहानुभूति समाज में वंचकों को बढ़ा देती है और उनकी संख्या में वृद्धि करती है। इसलिए इस बात का भी विशेष ध्यान रखना है कि हमारी व्यावहारिक, भावनात्मक, मौन अथवा मुखर सेवा का दुरुपयोग न हो।
इस प्रकार का विवेक विचार रखते हुये आज से ही सेवा कार्य में लगकर लगे रहिये, आपका आत्मिक अभाव दूर होगा, आपको सच्ची तथा स्थायी सुख-शाँति प्राप्त होगी।
---------------------------------------------------------------------------------------------------------
शिष्ट एवं सभ्य व्यवहार ही मनुष्य की शोभा है।
शील एवं शिष्टता मनुष्य के मानसिक-विकास के परिचायक गुण हैं। जिस अनुपात से मनुष्य का मानसिक-विकास होता जाता है उसी अनुपात से वह पशुता से उठकर मनुष्यता की ओर बढ़ता जाता है। इस प्रकार, एक दिन, वह शनैः शनैः बढ़ता हुआ अपने आत्म-स्वरूप तक पहुँचकर चिरन्तन सुख शान्ति का अधिकारी बन जाता है।
आत्म-स्वरूप की उपलब्धि सहसा नहीं होती। यह धीरे-धीरे क्रमपूर्वक मानसिक विकास द्वारा ही संभव होती है। शील एवं शिष्टता मनुष्य के मानसिक विकास के लक्षण हैं। इन्हीं लक्षणों द्वारा मनुष्य यह जान सकता है कि उसने कितना मानसिक विकास कर लिया है। जब कोई प्रत्येक क्षण प्रत्येक व्यक्ति के साथ यथायोग्य शीलता एवं शिष्टता का व्यवहार करने लगे तो उसे समझ लेना चाहिये कि उसका मानसिक विकास होना प्रारम्भ हो गया है। जिस दिन यह व्यवहार औरों के साथ रहने के अतिरिक्त अपनी आत्मा और आत्मा से बढ़कर समस्त जड़ चेतन के साथ होने लगे तो समझ लेना चाहिये कि अब हम आत्म-स्वरूप की परिधि के पास पहुँचने लगे हैं।
मनोविकास का अर्थ है—मनोविकारों का दूर होना। काम, क्रोध, मद, लोभ आदि विकार जितनी मात्रा में कम होते जाते हैं, उतनी ही मात्रा में मनोविकास होता जाता है। दुःशीलता एवं अशिष्टता के कारण भी ये मनोविकार ही हैं। काम मनुष्य को शील-रहित बना देता है। एक बार उसकी कामजन्य दुःशीलता अन्य किसी पर प्रकट नहीं होती तो अपनी आत्मा पर तो प्रकट हो ही जाती है। वह अपनी आत्मा के प्रति तो अशिष्ट एवं असभ्य हो ही जाता है। कामनाओं के रूप में जो काम मनुष्य में तीव्रता एवं लिप्सा उत्पन्न कर देता है। इससे मनुष्य में छल-कपट, शोषण, अपहरण आदि के दोष उत्पन्न हो जाते हैं।
क्रोध तो मनुष्य को एक प्रकार से सामयिक पागल ही बना देता है। क्रोध होने पर मनुष्य शिष्टता तथा सभ्यता की सारी सीमायें तक भूल जाता है। वह न कहने योग्य बातें कहने और न करने योग्य काम कर बैठता है। क्रोध में लोग छोटों के साथ तो दुर्व्यवहार करते ही हैं बड़ों के साथ भी अशिष्टता का व्यवहार कर बैठते हैं। क्रोध में मनुष्य बड़ों का बड़प्पन और आदरणीयों की गुरुता का भी मान नहीं करता। लोग अपने बड़े भाइयों यहाँ, तक कि माता-पिता तक को भी बुरा भला कहने लगते हैं क्रोध, धृष्टता एवं अशिष्टता का बहुत बड़ा कारण है।
मद मनुष्य को संसार में किसी को भी शालीन व्यवहार के योग्य नहीं समझने देता। मद का नशा क्रोध के वेग से अधिक बुरा होता है। जिसे धन वैभव रूप यौवन शक्ति , बल अथवा अधिकारों का अहंकार रहता है वह सचराचर जगत को तृणवत् ही समझा करता है। किसी से सीधे मुँह बात करना तो वह जानता ही नहीं। अहंकार मद से मतवाले व्यक्ति बहुधा दया, क्षमा, सहानुभूति एवं संवेदना जैसे मानवी गुणों को तिलाँजलि दे देते हैं। जरा-सी प्रतिकूलता पाकर अहंकारी व्यक्ति आपे से बाहर हो जाता है और बड़े-बड़े अनर्थ कर डालने पर उतर आता है। अनाचार, अत्याचार तथा अनीति आदिक दोष प्रायः अहंकार से ही जन्म पाते हैं। अहंकार मनुष्य को आततायी भी बना देता है। वह अपने दम्भ की तुष्टि में दूसरों की सुख-सुविधा का भी ध्यान नहीं रखता। वह अपनी प्रसन्नता के स्वार्थ में यह तक विचार नहीं कर पाता कि मेरे अमुक व्यवहार से अमुक व्यक्ति को अमुक कष्ट, दुःख अथवा क्लेश हो सकता है। अहंकारी एक अपने को प्रसन्न करने के लिये हजारों पर अत्याचार करने, उनका अधिकार छीनने में संकोच नहीं करता। अहंकार जैसा भयानक रोग मनुष्य को किस सीमा तक शील एवं शिष्टता से दूर हटा सकता है इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
पंडित नेहरु का वजन
एक बाल सम्मेलन के अवसर पर पंडित नेहरू बालक बालिकाओं के बीच प्रश्नोत्तर का आनन्द ले रहे थे। तभी एक बालिका ने प्रश्न किया—
“क्या आपने कभी अपना वजन भी लिया है?” पंडित नेहरू ने तुरन्त उत्तर दिया—”अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखने के कारण मैंने अनेक बार अपना वजन लिया।”
बालिका ने फिर दूसरा प्रश्न किया—”अच्छा बताइये, आपका सबसे ज्यादा और सबसे कम वजन कब और कितना था?”
नेहरू ने बिना रुके कहा—”मेरा सबसे ज्यादा एक सौ बासठ पौण्ड उस समय था जब मैं अहमदनगर जेल में था और सबसे कम साढ़े सात पौण्ड वजन जब मैं पैदा हुआ तब था।”
बालिका ने ताज्जुब से पूछा— “जेल में तो वजन कम हो जाना चाहिये बढ़ कैसे गया?”
पंडित नेहरू ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुये कहा— “उस समय मेरा वजन इस खुशी में बढ़ गया कि मैं अपने देश की सेवा में जेल का कष्ट सहन कर रहा हूँ।”
लोभ भी मनुष्य को स्वार्थी, संकीर्ण, निष्ठुर एवं क्रूर बना देता है। लोभी की तृष्णायें भयानक रूप से बढ़ जाती हैं। संसार की सारी दौलत पाकर भी लोभी की वित्तेषणा पूरी नहीं होती। बहुत कुछ पास होने पर भी लोभी की “और” नामक रट लगी ही रहती है। लोभी को जहाँ अपने लिये वस्तुओं की स्पृहा होती है वहाँ दूसरे की चीजों के प्रति बड़ी डाह होती है। वह यही चाहता है कि जो वस्तु मेरे पास है वह किसी दूसरे के पास न हो और यदि किसी के पास है तो मुझे मिल जानी चाहिये। संसार को विपन्न कर स्वयं सम्पन्न बनने की इच्छा लोभी की सहज स्वाभाविक मानसिक दुर्बलता होती है। अपने स्वार्थ-साधन अथवा लिप्सा की पूर्ति में लोभी कपटपूर्ण व्यवहार करने में भी नहीं चूकता। वह झूठ बोलकर आडम्बर बनाकर लोगों को ठगा ही करता है। अपने स्वार्थ के लिये वह किसी के साथ भी क्रूरता का व्यवहार कर सकता है। लोभी व्यक्ति धनी, निर्धन, सबल निर्बल, स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध किसी का भी सम्मान करना नहीं जानता। दया, दाक्षिण्य, सहायता, सहयोग, सहानुभूति एवं संवेदना, सद्व्यवहार मानों उसके शब्द कोष में नहीं होते। लालची व्यक्ति पराकाष्ठा तक कृपण होता है। वह किसी क्षुधार्त को भूखा मरते आँखों देख सकता है, किन्तु उसका पाषाण हृदय उसे एक बार भोजन कराना स्वीकार नहीं करेगा। एक पैसे के लिये किसी का बड़े से बड़ा काम बिगड़ते देख सकता है किन्तु एक पैसा देना स्वीकार नहीं करेगा। लोभी व्यक्ति तो अशिष्टता एवं अभद्रता का जीता जागता नमूना ही होता है।
इस प्रकार के मानसिक विकारों के रहते हुये कोई किस प्रकार अपना मानसिक विकास कर सकता है, और मानसिक विकास के अभाव में उसका आत्म स्वरूप की ओर बढ़ सकना सम्भव न होगा। अतएव आवश्यक है कि मनुष्य अपने मानसिक विकारों को दूर करे उन पर विजय प्राप्त करे और चिर साध्य सच्ची सुख-शाँति का अधिकारी बने।
मनोविकारों पर विजय पाने का साधारण-सा उपाय है—अपने अन्दर सभ्यता, शिष्टता तथा नम्रता का भाव उत्पन्न करना है। शिष्टता में एक अनुपम मिठास रहती है। एक बार का शिष्ट व्यवहार अपनी मधुरता से अनेक बार शिष्टता का व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है। जो सुशील है, सभ्य एवं शिष्ट है वह न केवल औरों को ही सुखी एवं शीतल बनाता है बल्कि अपने को भी सुखी बनाता है। शील एवं शिष्टता दैवी गुण हैं। इनका अवतरण कर लेने से मनुष्य सहज ही मानसिक विकास की ओर बढ़ने लगता है। अपने मनोविकास के लिये एक सच्चे, शिष्ट तथा शालीन व्यक्ति को किसी तप साधना अथवा पूजा अर्चना की जरूरत नहीं पड़ती। शिष्ट व्यवहार स्वयं ही अपने में एक पूजा है, एक उपासना है। एक उपासक तो केवल एक ईश्वर की कल्पना करके उसकी पूजा किया करता है, उसे प्रसन्न करने का प्रयत्न किया करता है, किन्तु एक नम्र एवं शिष्ट व्यक्ति न जाने कितने मनुष्यों की आत्मा प्रसन्न किया करता है जो कि ईश्वर का ही अंश होती है। उपासक एक देव की पूजा करता है और शिष्ट व्यक्ति अपने शालीन व्यवहार से सार्वजनिक विराट भगवान की पूजा किया करता है शिष्ट व्यवहार को केवल व्यवहार नहीं पूजा के भाव से ही देखना चाहिये।
भगवान की बनाई हुई चराचरमय सारी सृष्टि अपने युक्त व्यवहार से ही सुरक्षित एवं शाश्वत बनी हुई है। सृष्टि में अयुक्तता आते ही प्रलय एवं विनाश की सम्भावना उपस्थित हो जाती है। मनुष्य में जब तक शिष्टता एवं सभ्यता का उदय नहीं हुआ वह भी पशुओं की कोटि में बना रहा और उन्हीं की तरह जंगली जीवन व्यतीत करता रहा। ज्यों-ज्यों उसमें सभ्यता एवं शिष्टता की वृद्धि होती गई, उसका मनोविकास होता गया तो वह आज की उन्नत स्थिति में पहुँच सका। अपने सभ्यता एवं शिष्टता के जिन गुणों के आधार पर मनुष्य पशुता से वास्तविक मनुष्यता में आ सका है उसका त्याग कर देने से स्वाभाविक है कि वह अपनी आदिम अवस्था में वापस जाने लगे। आज भी जो व्यक्ति अश्लील, अशिष्ट अथवा असभ्य व्यवहार किया करता है उसे लोग नर-पशु ही मानते हैं। यह शील एवं शिष्टता का ही चमत्कार है कि मनुष्य पारस्परिक सहयोग एवं सहायता से अपने जीवन में इतनी सुख-सुविधाओं का समावेश कर सका है। यदि जंगलियों की तरह वे एक दूसरे से अशिष्ट तथा अभद्र व्यवहार करते रहे होते तो कैसे वो मिल-जुल कर रहते? कैसे मिलकर खेती तथा व्यवसाय करते? और कैसे मिल जुलकर विचार विमर्श करते हुये सभ्यता एवं संस्कृति का विकास कर पाते?
आत्मिक उन्नति के साथ-साथ शील एवं शिष्टता भौतिक उन्नति का भी आधार है। जो अशिष्ट है, असभ्य अथवा शील रहित है वह जीव जीवन में किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर सकता। नौकरी, व्यवसाय आदि किसी भी क्षेत्र में किसी धृष्ट की सफलता का कोई उदाहरण आज तक नहीं पाया है। धृष्ट अथवा अशिष्ट व्यक्ति को कोई भी पसन्द नहीं करता और न कोई उससे सहयोग ही करना चाहेगा। मनुष्य के बड़े से बड़े गुण, बड़ी से बड़ी क्षमतायें अशिष्टता के दोष से दूषित होकर नष्ट हो जाती हैं। बहुत कुछ उपयोगी होने पर भी दुष्ट अथवा दुर्मुख व्यक्ति के पास कोई जाना तक पसन्द नहीं करेगा। अशिष्ट व्यक्ति एक प्रकार से समाज से बहिष्कृत ही रहता है।
धृष्ट अथवा अशिष्ट विद्यार्थी बहुत कम सफल होते हैं। कर्कशा पत्नी कभी भी पति का प्यार नहीं पा सकती और कठोर पति कभी भी गृहस्थी की सुख-शाँति नसीब नहीं कर सकता। धृष्ट तथा अशिष्ट बच्चे और तो और स्वयं अपने माता-पिता के लिये भी घृणा के पात्र बन जाते हैं। असफलता एवं अशाँति अशिष्टता एवं असभ्यता का सुनिश्चित परिणाम है।
इसके विपरित विनम्रता, मधुरता, शिष्टता एवं सभ्यता पूर्ण व्यवहार मनुष्य को सफलता के उच्च शिखर पर पहुँचा देने में सक्षम होते हैं। निर्धन होने पर भी शिष्ट विद्यार्थी की शिक्षा रुकने नहीं पाती। किसी नौकरी में शिष्टता एक बार योग्यता की कमी को भी पूरा कर देती है। जो स्वयं सही मायनों में शिष्ट एवं सभ्य है उसे किसी काम के लिये किसी की सिफारिश की आवश्यकता नहीं पड़ती। विनम्रता एवं मधुरता क्रूर से क्रूर शत्रु को जीत लिया करते हैं। सहयोग, सहायता एवं सहानुभूति शिष्ट एवं शीलवान व्यक्ति की विरासत ही माननी चाहिये। घर बाहर, देश परदेश, कहीं भी क्यों न रहे विनम्रता एवं शिष्टता मनुष्य को मित्र की तरह हर जगह सहायता करती रहती है। विनम्र व्यवहार विरोधों के बीच भी अपना मार्ग बना लिया करता है।
जो शिष्ट एवं सभ्य होता है वह सहिष्णु भी होता है। शिष्ट दूसरे से तो दुखदायी व्यवहार नहीं करता है यदि उसके साथ भी दुःखद व्यवहार किया जाता है तब भी वह अधिक दुखी नहीं होता। न तो उस पर कोई अप्रिय प्रतिक्रिया होती है और न उसे क्रोध ही आता है। विपरित व्यवहार में भी उसकी मनः शाँति अक्षुण्ण बनी रहती है। बदले में बुरा व्यवहार न करके वह अपने धृष्ट विरोधी को भी लज्जित कर देता है। शिष्ट एवं सभ्य के सम्मुख संघर्ष की परिस्थितियाँ बहुत कम आती हैं और यदि आती भी हैं तो वे उलझकर अधिक भयानक नहीं बनने पातीं। वह बिना किसी हानि के उन्हें सुलझा लिया करता है। इस प्रकार कोई भी शिष्ट एवं सभ्य व्यक्ति सदा ही संघर्षहीन, निर्द्वन्द्व एवं सौहार्द्रता पूर्ण सुख शाँति का जीवन व्यतीत किया करता है। मनुष्य को चाहिये कि वह स्थायी सुख शाँति के लिये विकारों को दबाकर शिष्ट एवं सभ्य बने तथा शिष्ट एवं सभ्य व्यवहार के अभ्यास से विकारों पर विजय प्राप्त करें।

Friday, May 20, 2016

बदलाव

मित्रों, मैं उस पीढ़ी का हूँ जिसने के स्वतंत्रता-शिशु की गोद में अपनी आँखें खोली और जो इस देश के साथ बड़ा होता हुआ आज बुजुर्ग हो गया है। ये दीग़र बात है कि देश जवानी के दौर में है। मेरी पीढ़ी वो पीढ़ी हे जो लालटेन से कंप्यूटर तक की यात्रा की है। मेरी पीढ़ी ने युद्ध और शांति के अध्याय पढ़े हैं। मेरी पीढ़ी ने राशन की पँक्तियों में खड़ी ग़रीबी देखी है तो चमचमाते मॉलों में, विदेशी ब्रांड के लिए नौजवानों की पागल भीड़ देख रही है। मेरी पीढ़ी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण देखा है, हरित क्रांति की हरियाली देखी है तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चमचमाते सूदखोर बनिए जैसे ग़ैरराष्ट्रीयकृत बैंक देखे हैं तथा समृद्ध, विदेशी निवेश से चढ़ते शेयर बाज़ार के सैंसक्स के बीच भारत में आत्महत्या करते हुए किसान भी देखे हैं। मैंनें विश्व में छायी मंदी के बावजूद देश की अर्थ-व्यवस्था की जी डी पी को बड़ते देखा है पर साथ ही ईमानदारी, नैतिकता, करुणा आदि जीवन मूल्यों की मंदी के कारण ग़रीब की जीडीपी को निरंतर गिरते ही देखा है।
देश स्वतंत्र हुआ तो उसके अनेक मायने लगाए गए । प्रभु की मूरत की तरह, प्रत्येक ने स्वतंत्रता-प्रभु को जाकि रही भावना जैसी अंदाज़ में देखा। कुछ के लिए आज़ादी, दो रोटी से आठ रोटी के जुगाड का यंत्र बन गयी तो कुछ के लिए, रही-सही दो रोटियाँ बचाने का प्रयत्न बन गयी । बहुतों का आज़ादी से मोह भंग हुआ तो कुछ के लिए आज़ादी मोह का कारण बन गयी । अनेक ऐसे संत पैदा हुए जिन्होंनें दूसरों को तो इस मोह से दूर रहने के प्रवचन सुनाए और स्वयं इस ‘मोह’ की चरण-वंदना में डूब गए । ऐसे लोग जितना डूबे उतना ही तरे । ये दूसरों को डुबाने के लिए तरे ।
स्वतंत्रता के बाद राजनैतिक क्षेत्र में विसंगतियाँ अधिक बढीं । स्वतंत्रता से पहले लडाई का शत्रु स्पष्ट था । सभी जानते थे कि वो किसके ख़िलाफ़ लड रहे हैं, और इस लडाई में हथियार भी उठते थे । शत्रु की शत्रुता स्पष्ट थी । स्वतंत्रता से पहले विषय की दृष्टि से उसकी सीमाएँ भी थीं वह आज़ादी के बाद दूर हो गयीं । विदेशी शासन के ख़िलाफ़ सीधे-सीधे लिखने के बहुत ख़तरे थे , यही कारण है कि भारतेंदु ने शासन की विसंगतियों को प्रकट करने के लिए ‘अंधेर नगरी’ का सृजन किया । भारतेंदु द्वारा तत्कालीन शासन की विसंगतियों की आलोचना का यह रूप अप्रत्यक्ष था । भारत में प्रजातंत्र की स्थापना ने विचार की जो स्वतंत्रता दी उससे शासन की विसंगतियों की प्रत्यक्ष आलोचना का अधिकार मिल गया । आज़ादी आई और उस आज़ादी से लोगों को आशाएँ भी बहुत थी । अक्सर भविष्य स्वर्णिम लगता है परन्तु जब वह वर्तमान में बदल जाता है तो मोह भंग की स्थिति पैदा करता है, क्योंकि अपने स्वर्णिम भविष्य से हम अपनी बहुत आशाएँ जगा चुके होते हैं । इसके साथ यह भी सत्य है कि अपनी आज़ादी के लिए लड़ने वाले जब आज़ादी पा लेते हैं, सता सम्भाल लेते हैं, तो लड़ने वालों का चरित्र बदल जाता है । अनेक विसंगतियाँ जन्म लेने लगती हैं । धीरे-धीरे देश की राजनीति मूल्यों से खिसक कर, इतनी मूल्यवान होने लगी कि अनेक व्यावसायियों के आकर्षण का केंद्र बन गयी । राजनीति के अपराधीकरण ने ‘महान’ देशभक्तों को सुअवसर प्रदान किया कि वे जेलों की चार दिवारी से बाहर निकलें और राष्ट् के निर्माण में अपना अभूतपूर्व योगदान दें । एक समय अपने राजनैतिक आकाओं की सता बहाली के लिए किसी को भी उनके रास्ते से हटाने वाले सेवको को अपना महत्व तथा सता के ख़ून का स्वाद मिल ही गया । एक समय था राजनीति में कुत्तों का बहुत बडा महत्व था, धीरे-धीरे उनका स्थान भेड़ियों ने ले लिया । ऐसी अनेक राजनैतिक विसंगतियाँ थीं जिनके कारण सजग साहित्यकार के विचार तंतुओं पर दबाव पडा । एक पीड़ा ने उसके अंदर जन्म लिया । देश के प्रति उसकी निष्ठा ने उसको विवश किया कि वह इन विसंगतियों के विरुद्व अपने आक्रोश को अभिव्यक्त करे । जैसे-जैसे विसंगतियाँ बढीं वैसे-वैसे र्व्यंग्य लेखन में वृद्वि हुई ।
समाज में कोई व्यक्ति या समूह सामाजिक मर्यादाओं, मूल्यों अथवा आदर्शों के विरुद्ध जाता है तो उसे सही मार्ग पर लाने के अनेक तरीके हैं । एक तरीक़ा तो यह है कि सज़ा का डर दिखाकर उसे सुधारा जाए पर अक्सर सज़ा व्यक्ति को अपराधी बनाए रखती है । दूसरा तरीक़ा यह है कि उसे नैतिकता की कड़वी खुराक़- सा भाषण पिलाया जाए पर जिसे प्यास ही न हो उसे कुछ भी पीना अच्छा नहीं लगता । तीसरा तरीक़ा यह है कि उसका सरे आम मज़ाक़ उड़ाया जाए । सरे आम उड़ाया गया मज़ाक़ बहुत आहत करता है और आहत व्यक्ति महाभारत का युद्ध तक लड़ लेता है । सभी जब एकसाथ किसी एक व्यक्ति या प्रवृत्ति का मज़ाक़ उड़ाते हैं तो मुँह छुपाना कठिन हो जाता है । व्यंग्यकार की महत्वपूर्ण भूमिका यही है कि वह लक्ष्य की विसंगतियों की पहचान कर उसका मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिक दबाव के आगे झुकना उसकी मजबूरी है । किसी सामाजिक विसंगति का मज़ाक़ बनाकर वह अपने साथ अपने पाठकों की एक फौज तैयार करता है । यह फौज ही उसका हथियार होती है । वह विसंगति को प्रचारित कर लक्ष्य को शर्मिंदा करता है । एक चोर या डकैत को चोर या डकैत कहलाने में कोई शर्म नहीं आती है । उसकी चोरी या डकैती चर्चे प्रकाशित होते हैं तो वह हीरो बन जाता है । पर खादी पहन सेवा के नाम पर देश की डकैती करने वाले का चेहरा जब प्रचारित होता है तो वह अपने तथाकथित साफ चेहरे की सफाई देने लगता है । यहाँ व्यंग्यकार के बारे में एक बात मैं साफ – साफ कहना चहता हूँ । व्यंग्यकार चाहे कितना आक्रोश प्रगट करे, कितनी ही आक्रामक मुद्रा ग्रहण करे और स्वयं को नायक समझने की भूल करे, उसका यथार्थ यह है कि वह अपने लक्ष्य के दुष्ट स्वभाव को बदल पाने में व्यक्तिगत धरातल पर नपुंसक विरोध के अतिरिक्त कोई ताक़त नहीं रखता है । उसके विरोध को तो हँसकर उड़ाया जा सकता है । उसकी असली ताक़त पाठकों की उसकी फौज है, जिस फौज सामने नंगा होने से विसंगतिपूर्ण चरित्र डरता है। आदमी यथार्थ के प्रकटीकरण सें उतना नहीं डरता है जितना विसंगति के नंगा होने से ।
समाज वही होता है पर उसे देखने के हमारे अपने-अपने यथार्थ होते हैं । आज का सामाजिक यथार्थ यह है कि हमसे हमारा यथार्थ बहुत पीछे छूटता जा रहा है । सबसे पहला सवाल तो यही है कि आज का हमारा सामाजिक यथार्थ क्या है? जब समाज को देखने के भिन्न-भिन्न नज़रिए होंगें तो सामाजिक यथार्थ भी भिन्न ही होगा । आजकल तो समाजिक परिवेश को को विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के चश्मे से देखने की अपनी- अपनी दृष्टियॉं हैं । समाज देखने का मेरा नज़रिया तेरे नज़रिए से बेहतर सिद्ध करने में हमारे कर्णधार वैसे ही व्यस्त हैं जैसे दशहरे के समय में अपने – अपने रावणों का बेहतर क़द देखकर राम के ‘धार्मिक’ भक्त प्रसन्न होते हैं । जब हम अपने आस-पास के लोगों से मिलते हैं तो अक्सर बहुत ही औपचारिक सवालों के साथ मिलते हैं ।” और क्या चल रहा है ? जीवन कैसा चल रहा है ? ” जैसे सवालों का उत्तर देते समय कुछ आस्तिक सा उत्तर देते हैं – उपर वाले की कृपा है । कुछ उदासी को स्वर में घोलकर कहते हैं - ठीक है । कुछ जीवन को कट रहा बताते हैं, कुछ बस चल रही है कहकर सवाल से छुटकारा पाने की मुद्रा में होते हैं तो कुछ बस जी रहे हैं जैसी निर्लिप्त मुद्रा में और कुछ के लिए जीवन व्यर्थ बहा, बहा दो सरस पद भी न हुए अहा ! होती है । कुछ इतनी तेज़ी में होते हैं कि आप पूछते जीवन के बारे में हैं और वो आपके सवाल को अनसुना कर अपनी हाँकते हैं तथा किसी को भी एक दो गालियॉं सुनाकर ये जा वो जा होते हैं । तुलसी बाबा के स्वर में स्वर मिलाकर कह सकते हैं कि जाकि रही भावना जैसी जीवन मूरति देखी तिन तैसी । ऐसे ही ज्ञानीजन समाज को अनेक रूपों में देख डालते हैं । कुछ के लिए धर्म की हानि हो रही है और समाज रसातल मे जा रहा है तथा अब प्रलय हुआ ही चाहती है । कुछ गांधी बाबा के बंदरों की तरह आँख कान मुँह, सब कुछ, मूंद लेना चाहते हैं । कुछ त्यागी समाज को गंदगी से बचाने के लिए स्वयं गंदगी के ढेर पर जा बैठते हैं । कुछ समाज में रहते हुए कमल से निर्लिप्त स्वयं में ही लिप्त रहते हैं । उनको न्याय – अन्याय, अच्छा- बुरा, ईमानदारी- बेईमानी में से कुछ भी नहीं व्याप्ता है । कुछ खाते हैं और सोते हैं और कुछ कबीर की तरह जागते और रोते हैं । कुछ के लिए उनका पुराना ज़माना ही अच्छा था चाहे उस जमाने में चीर-हरण होते रहे हों, अपहरण होते रहे हों, शम्बूकों की हत्याएँ होती रही हों । कुछ समाज में रहते हैं पर समाज के बारे में सोचने के लिए उनके पास समय नहीं है, बहुत बिजी़ लोग हैं । आप समाज का निरर्थक अर्थ निकालने की चिंता में अपने बाल नोच-नोच कर दुबले हुए जाते हैं और यह सार्थक अर्थालाभ कर अपने घर को भरने की जुगाड़ में मुटियाए जाते हैं । कुल मिलाकर कह सकते हैं कि विश्व परिवर्तनशील और उसी लय में समाज भी परिवर्तनशील है। समाज अपने को अनेक स्तरों पर जीता है और उन स्तरों पर छोटे बड़े, अनेक परिवर्तन एक समूह को जन्म देते हैं। अज्ञेय ने ‘लेखक और परिवेश’ में परिवेशगत परिवर्तनों के बारे में कहा है- आज की बड़ी दुनिया में मेरा परिवेश स्थितिशील नहीं है, वह सतत चलनशील है! सभी संबंध गतिशील हैं। उनका जो रूप मेरी चेतना को छूता है वह छूने-छूने में बदलता जाता है। बल्कि वह छुअन ही मानों नाड़ी की छुअन है या कि एक घूमते हुए पहिए के नेमे की- जिसका स्पर्श भी नहीं कहता कि ”मैं हूँ” यही कहता है कि मैं हो रहा हूँ… या कि इससे भी आगे ‘मैं होते- होते यह – यह नहीं वह होता जा रहा हूँ’… जिस परिवर्तन के बीच में रहता हूँ - यानी मेरा जो परिवेश है वह एक असुंतलन से दूसरे असंतुलन तक का है।’
अज्ञेय ने अपने समय की, बड़ी दुनिया की बात की है और अज्ञेय के बाद यह दुनिया कितनी और बड़ी हो गई है, हम सब देख ही रहे हैं। आज से लगभग तीन दशक पहले लिखे इस लेख में अज्ञेय ने उस विवशता की चर्चा की है जहाँ ‘मैं होते- होते यह-यह नहीं वह होता जा रहा हूँ’… और इस परिवर्तन के बीच जो परिवेश है वह एक असुंतलन से दूसरे असंतुलन तक का है।’ पिछले एक दशक में यह असंतुलन अधिक विस्तृत हुआ है। वर्तमान व्यवस्था असंतुलन के संतुलन व्यवस्थित कर अपने स्वार्थों को सिद्ध करने में व्यस्त है। नव उदारवाद आर्थिक वैषम्य की खाई को निरंतर बढ़ाता जा रहा है और इसके लिए उसने मध्यम वर्ग को अपना टूल बनाया है। उसकी संस्कारशील, मानवीय मूल्यों के प्रति चिंतित, अस्मिता एव संस्कृति के प्रति सजग तथा गलत के विरुद्ध, चेतना को, पूँजी की चकाचौंध से सुप्त करने का निरंतर षड़यंत्र चालू आहे। बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा, मध्यम वर्ग की नयी पीढ़ी को तीन चार गुना वेतन देकर उसकी सामाजिकता और परिवार छीन लिया है।
एक भयंकर षड़यंत्र चल रहा है और पूँजीवाद हमारा स्वामी बनने के लिए अनेक प्रकार ‘आयोजन’ कर रहा है। कभी अचानक हमारे देश की दो एक सुंदरियों को विश्व सुंदरी बनाकर यहाँ अपना बाज़ार फैला लिया जाता है और कभी आपकी भाषा को सर्वप्रिय बनाने के छद्म में आपकी भाषा छीनी जाती है। वैश्वीकरण और विश्वव्यापार की स्थितियाँ सभी को प्रभावित कर रही हैं। एक समय था बीस कोस पर भाषा अदल जाती थी और तीस कोस पर पानी बदल जाता था। आजकल सब जगह एक-सा ही पानी मिलता है - बोतल में बंद तथाकथित मिनरल वॉटर। दिल्ली को उसकी गलियाँ छोड़कर चली गई हैं और उनका स्थान मॉल-संस्कृति ने ले लिया है। पहले हर शहर की एक पहचान होती थी जो उसकी भाषा, संस्कृति, खान-पान तथा गलियों कूचों से जुड़ी होती थी, पर अब वो धीरे-धीरे गायब होती जा रही है। सभी शहर एक से लगने लगे हैं। निर्मला जैन की एक नयी संस्मरणात्मक कृति आई है, ‘दिल्ली शहर दर शहर’ जिसमें उन्होंनें दिल्ली के बदलते चेहरे का बहुत ही बारीकी से प्रस्तुतिकरण किया है। आज जब वो अपनी दिल्ली को पीछे मुड़कर देखती है तो लगता है कि ये दिल्ली तो वो रही नहीं, जिसकी गलियों में वे खेल खेलकर बड़ी हुईं। इस बदलाव के कारणों एवं षड़यंत्र पर अपनी नज़रिया प्रस्तुत करते हुए वे लिखती हैं- हर शहर का अपना एक चेहरा होता है, जो उसकी जीवन-शैली, बोली -बानी मेले-ठेलों, रीति – रिवाज़ों यानी कुल जमा सांस्कृतिक विन्यास से पहचाना जाता है। वर्तमान परिदृश्य में सभी शहरों की जीवन शैलियॉँ एक महा-मंथन की गिरफ़्त में हैं। बहु राष्ट्रीय कंपनियाँ सबका ‘महानगरीय’ ब्रांडधर्मी संस्कृति में कायाकल्प करने में लगी हैं। मुनाफ़ा इसी में है, जिसके लिए वे ग्रामीण क्षेत्रों में भी घुसपैठ करने की फ़िराक़ में हैं। सवाल जातीय विशिष्टताओं और अस्मिताओं को अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के आक्रमण से बचने का है। कौन कितना बचेगा, जैसे यह तय नहीं, वैसे ही यह भी निश्चिय करना संभव नहीं कि अंतिम परिणति किसके हित में होगी।’
मित्रों, केवल शहरों का चेहरा ही नहीं बदल रहा है, व्यक्ति के अंदर का चेहरा भी बदल रहा है। नव उदारवाद अधिक आर्थिक अर्जन की जठराग्नि में निरंतर घी डालकर उसे धधका रहा है। वर्तमान व्यवस्था में पैसे की ताक़त ने सामाजिक को विवश कर दिया है कि उसका एकमात्र लक्ष्य, जैसे-तैसे अधिक धन का उपार्जन रह जाए। ये पैसे की ताक़त ही है कि पचास रुपए की चोरी करने वाला पुलिस के डंडे खाता है, जेल जाता है और पचासों करोड़ की चोरी करने वाला टीवी चेनलों में हीरो बनता है। इतने आर्थिक घोटाले हुए हैं पर कितने को हमारी न्यायव्यवस्था ने सज़ा के योग्य समझा ये किसी से छुपा नहीं है। हमारी जनता की स्मृति बहुत क्षीण है। आज नंगई की मार्केटिंग का धंधा जोरों पर चल रहा है और साहित्य में भी ऐसे धंधेबाज़ों का समुचित विकास हो रहा है । कुटिल -खल-कामी बनने का बाज़ार गर्म है । एक महत्वपूर्ण प्रतियोगिता चल रही है — तेरी कमीज मेरी कमीज़ से इतनी काली कैसे ? इस क्षेत्र में जो जितना काला है उसका जीवन उतना ही उजला है । कुटिल– खल-कामी होना जीवन में सफलता की महत्वपूर्ण कुंजी है । इस कुंजी को प्राप्त करते ही समृद्धि के समस्त ताले खुल जाते हैं । बहुत आवश्यक है सामाजिक एवं आर्थिक विसंगतियों को पहचानने तथा उनपर दिशायुक्त प्रहार करने की । पिछले दस वर्षों में पूँजी के बढ़ते प्रभाव, बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ‘संस्कृति’ के भारतीय परिवेश में चमकदार प्रवेश ने हमारी मौलिकता का हनन किया है। अचानक दूसरों का कबाड़ हमारी सुंदरता और हमारी सुंदरता दूसरों का कबाड़ बन रही है । सौंदर्यीकरण के नाम पर, चाहे वो भगवान का हो या शहर का, मूल समस्याओं को दरकिनार किया जा रहा है । धन के बल पर आप किसी भी राष्ट्र को श्मशान में बदलने और अपने श्मशान को मॉल की तरहा चमका कर बेचने की ताक़त रखते हैं ।
आजकल आत्मा की आवाज़ की जैसे सेल लगी हुई है । जिसे देखो वो ही आत्मा की आवाज़ सुनाने को उधर खाए बैठा है । आप न भी सुनना चाहें तो जैसे -क्रेडिट कार्ड, बैंकों के उधारकर्त्ता, मोबाईल कंपनियों के विक्रेता अपनी कोयल-से मधुर स्वर में आपको अपनी आवाज़ सुनाने को उधार खाए बैठे होते हैं, वैसे ही आत्मा की आवाज़ सुनने-सुनाने का धंधा चल रहा है । कोई भी धाार्मिक चैनल खोल लीजिए, स्वयं अपनी आत्मा को सुला चुके ज्ञानीजन आपकी आत्मा को जगाने में लगे रहते हैं । आपकी आत्मा को जगाने में उनका क्या लाभ ? प्यारे जिसकी आत्मा मर गई हो वो धरम-करम कहाँ करता है, धरम-करम तो जगी आत्मा वाला करता है और धरम-करम होगा तभी तो धार्मिक-व्यवसाय फलेगा और फूलेगा। धर्म एक उद्योग हो गया है। इसलिए जैसे इस देश में भ्रष्टाचार के सरकारी दफ़्तरों में विद्यमान होने से वातावरण जीवंत और कर्मशील रहता है वैसे ही आत्मा के शरीर में जगे रहने से ‘धर्म’ जीवंत और कर्मशील रहता है । कबीर के समय में माया ठगिनी थी, आजकल आत्मा ठगिनी है । माया के मायाजाल को तो आप जान सकते हैं, आत्मा के आत्मजाल को देवता नहीं जान सके आप क्या चीज़ हैं । सुना गया है कि आजकल आत्मा की ठग विद्या को देखकर बनारस के ठगों ने अपनी दूकानों के शटर बंद कर लिए हैं । आत्मा की आवाज़ कितनी सुविधजनक हो गई है, जब चाहा जगा दिया जब चाहा सुला दिया जैसे घर की बूढ़ी अम्मा, जब चाहा मातृ-सेवा के नाम पर , दोस्तों को दिखाने के लिए ड्राईंग रूम में बिठा लिया और जब चाहा कोने में पटक दिया ।

Wednesday, May 18, 2016

1947. से 1987 के बीच जन्में है, हमें विशेष आशीर्वाद प्राप्त हैँ

हम लोग, जो 1947. से 1987 के बीच जन्में है, हमें विशेष आशीर्वाद प्राप्त हैँ,
....और ऐसा भी नही कि आधुनिक संसाधनों से हमें कोई परहेज है......!!!
लेकिन.....
हमें कभी भी जानवरों की तरह किताबों को बोझ की तरह ढो कर स्कूल
नही ले जाना पड़ा ।
हमारें माता- पिता को हमारी पढाई को लेकर कभी अपने programs
आगे पीछे नही करने पड़ते थे...!
स्कूल के बाद हम देर सूरज डूबने तक खेलते थे
हम अपने real दोस्तों के साथ खेलते थे; net फ्रेंड्स के साथ नही ।
जब भी हम प्यासे होते थे तो नल से पानी पीना safe होता था और
हमने कभी mineral water bottle को नही ढूँढा ।
हम कभी भी चार लोग गन्ने का जूस उसी गिलास से ही
पी करके भी बीमार नही पड़े ।
हम एक प्लेट मिठाई और चावल रोज़ खाकर भी मोटे नही हुए ।
नंगे पैर घूमने के बाद भी हमारे पैरों को कुछ नही होता था ।
हमें healthy रहने के लिए Supplements नही लेने पड़ते थे ।
हम कभी कभी अपने खिलोने खुद बना कर भी खेलते थे ।
हम ज्यादातर अपने parents के साथ या grand- parents के पास ही रहे ।
हम अक्सर 4/6 भाई बहन एक जैसे कपड़े पहनना शान समझते थे.....
common.
वाली नही एकता वाली feelings ... enjoy करते थे......!
हम डॉक्टर के पास नहीं जाते थे, पर डॉक्टर हमारे पास आते थे
हमारे ज़्यादा बीमार होने पर ।
 हमारे पास न तो Mobile, DVD's, PlayStation, Xboxes,
PC, Internet, chatting,
क्योंकि हमारे पास real दोस्त थे ।
हम दोस्तों के घर बिना बताये जाकर मजे करते थे और
उनके साथ खाने के मजे लेते थे।
कभी उन्हें कॉल करके appointment नही लेना पड़ा ।
 हम एक अदभुत और सबसे समझदार पीढ़ी है क्योंकि हम अंतिम पीढ़ी हैं जो की
अपने parents की सुनते हैं... और साथ ही पहली पीढ़ी जो की अपने बच्चों की सुनते हैं ।

We are not special, but. We are LIMITED EDITION and we are enjoying the
Generation Gap......

ईश्वर (सत्य, विश्वास) ही है

ईश्वर (सत्य)

भगवान एक ऐसी महाशक्ति है, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, और उसमे जीवन निर्वाह कर रहे प्रत्येक जीव और निर्जीव वस्तु में विधमान है ! और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और उसमे रहने वाले प्रत्येक जीव-जंतु उसके ऋणी है, और उसके आदेशो का पालन करना, उनका धर्म हैं ! वह ऐसा ईश्वर है, जिसमे हर प्रकार की प्रसंशा के गुण समाहित हैं ! उसकी पूजा करने या न करने से उसकी सत्यता पर कोई प्रभाव नही पड़ने वाला ! और न ही उसकी पूजा करने के लिए उसने किसी को बाध्य किया ! बल्कि उसकी पवित्रता और सत्यता को देखकर हम विवश हो जाते हैं उससे मानने और उसकी पूजा करने के लिए ! और वो ऐसी अदभुत शक्ति है जिसे चाह कर भी झुठलाया नहीं जा सकता ! सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पर राज करने वाला वो इकलौता ईश्वर ही पूज्निये है! और उसके अलावा किसी और की पूजा करना महापाप है! वो किसी के द्वारा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उसके द्वारा रचा गया, हमेशा से जीवंत, सत्य का साथी, सभी प्राणियों के हृदय में विराजमान, दुखिया का सहारा, पूंजीपतियों का लाभ, प्रत्येक व्यक्ति की आस्था, मोक्ष तक पहुँचने का रास्ता, धर्मो की नहीं बल्कि हृदय की सच्ची पुकार सुनने वाला, बिना आकर और बिना सूरत वाला ईश्वर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में आलौकिक शक्तियों के साथ आज भी जीवंत है ! और यही सत्य (ईश्वर) है ! या आप इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं-
वह तेजस्वियों का तेज, बलियों का बल, ज्ञानियों का ज्ञान, मुनियों का तप, कवियों का रस, ऋषियों (पीर, फकीर, दरवेश, बाबा, भक्त) का गाम्भीर्य और बालक की हंसी में विराजमान है। ऋषि के मन्त्र गान और बालक की निष्कपट हंसी उसे एक जैसी ही प्रिय हैं। वह शब्द नहीं भाव पढता है, होंठ नहीं हृदय देखता है, वह मंदिर में नहीं, मस्जिद में नहीं, प्रेम करने वाले के हृदय में रहता है। बुद्धिमानों की बुद्धियों के लिए वह पहेली है पर एक निष्कपट मासूम को वह सदा उपलब्ध है। वह कुछ अलग ही है। पैसे से वह मिलता नहीं और प्रेम रखने वालों को वो कभी छोड़ता नहीं। उसे डरने वाले पसंद नहीं, प्रेम करने वालो को उसे ढून्ढने की ज़रूरत नहीं। सबसे अलग, सबसे शक्तिशाली, सभी में विराजमान और सबके हृदय में धड़कने वाला वो एक ईश्वर (सत्य, विश्वास) ही है।
यदि हम ईश्वर को अपने दिल और हर जीवित वस्तु में नहीं देख सकते तो, हम ईश्वर को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का भ्रमण करके भी प्राप्त नहीं कर सकते