Tuesday, August 1, 2017

पहले “रैगर रत्न पुरस्कार” देना, बाद में “रैगर रत्न” पदक की खिलाफत करना, राष्ट्रीय अध्यक्ष ने मेरी भावनाओ और मान-प्रतिष्ठा से खिलवाड़ किया है : सुनील बोकोलिया

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दिल्ली, लोकहित एक्सप्रेस, (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । 25 दिसम्बर 2016 को जयपुर में सार्वजानिक सभा में अखिल भारतीय रैगर महासभा ने गौरवपूर्णं और सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार “रैगर रत्न” सुनील कुमार बोकोलिया को राष्ट्रीय अध्यक्ष भंवर लाल नवल ने अपने करकमलो से प्रदान किया था । लेकिन सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार “रैगर रत्न” देने के बाद में राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा विरोध सभा आयोजन किये जाने से रुष्ट होकर सुनील कुमार बोकोलिया ने “रैगर रत्न पुरस्कार” बापिस लौटा दिया ।
अखिल भारतीय रैगर महासभा के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार को “रैगर रत्न” के रुप में जाना जाता है। ये सम्मान रैगर समाज के किसी भी सदस्य को लिंग और उम्र के भेदभाव के बिना उत्कृष्ट कार्यो और विशेष योग्यता के लिए प्रदान किया जाता है। “रैगर रत्न”  पुरस्कार रैगर समाज का गौरवपूर्णं और सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। अखिल भारतीय रैगर महासभा के मंत्रिमंडल और कार्यकारिणी का चुनाव समाज के 2501 प्रतिनिधियों के द्वारा किया जाता है । 
25 दिसम्बर 2016 को जयपुर में सार्वजानिक सभा में मुझे अखिल भारतीय रैगर महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा स्वहस्ताक्षरित “रैगर रत्न” प्रमाण पत्र अपने करकमलो से प्रदान किये जाने के बाद 8-1-2017 को रैगर रत्न के विरोध में सभा आयोजित कर 28-1-2017 को कार्यालय आदेश जारी करते है । ये दोनों कार्य मेरी भावनाओ और मान-प्रतिष्ठा को आघात करता है । इससे दुखी होकर मैंने रैगर रत्न बापिस लौटाने का निर्णय लिया ।
सुनील कुमार बोकोलिया ने अपने पत्र में कहा है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष को पदक से नाराज़गी थी तो प्रमाण पत्र पर हस्ताक्षर क्यों किये? क्या कोई रिटायर्ड IAS अधिकारी बिना सोचे समझे हस्ताक्षर है ? पुरस्कार पर बाकी के चार पदाधिकारी भी कुछ आंकलन करके ही हस्ताक्षर किये होंगे क्या वे समाज के जिम्मेदार लोग नहीं थे ? अखिल भारतीय रैगर महासभा ने मेरा पद गलत लिखकर मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया है, जिसके लिए मैंने उसी समय अवगत करा दिया था । ऐसा प्रतीत हो रहा है समाज के प्रति वफ़ादारी निभा रहे लोगो की वफादारी के साथ छेड़छाड़ शुरू हो गई है ।
इस घटनाक्रम को लेकर समाज के लोगो में अखिल भारतीय रैगर महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कार्यशैली से निराश और दुखी है । एक सज्जन ने तो यहाँ तक कह दिया की आज अखिल भारतीय रैगर महासभा में जो परिस्थितियां बनी हुई, उससे समाज का विकास होना मुश्किल है । ये कविता सुना दी:-
चुनाव जितने के लिए वादे किये हैं बहुत, किन्तु पूरा करेंगे ये वादा नहीं !
जिनके कार्यो में विश्वसनीयता नहीं, उनके सहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
जिनके आने से समाज का विकास ना हो, उन नेताओ की हम को ज़रूरत नहीं !

हम समाज विरोधियो से समाज बचाते रहे, पर आज कर्णधारो ने छलावा किया !!

Tuesday, July 25, 2017

एक ऐसा विद्यालय जहाँ शिक्षक नियुक्त है, सैलेरी भी टाइम पर आती है, परन्तु विद्यार्थी एक नहीं है

दिल्ली, लोकहित एक्सप्रेस, (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । सरकारी स्‍कूलों के हालात से तो हम सभी वाकिफ हैं कि स्कूल का भवन और विद्यार्थी तो होते है परन्तु शिक्षक नहीं होते, लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि राजस्थान के सीकर जिले में कांवट कस्बे के प्रतापपुरा गांव में एक ऐसा स्‍कूल भी है, जहां पढ़ाने के लिए टीचर्स तो हैं लेकिन पढ़ने वाला कोई नहीं। प्रतिमाह करीब एक लाख से ज्यादा रुपए की पगार लेने वाले ये चार शिक्षक पेड़ पौधों में पानी डालकर और अपना टाइमपास करके वापस अपने घर लौट जाते हैं । राजस्थान का यह स्‍कूल बाकी स्‍कूलों से बहुत अलग है।
राजस्थान के सीकर जिले में कांवट कस्बे के प्रतापपुरा गांव में शिक्षा विभाग ने संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अलग से संस्कृत स्कूल 1998 में खोला गया था । उस समय इस स्कूल में पास के गांवों से भी बच्‍चे पढ़ने आते थे। 2005 में, बच्‍चों की संख्‍या 55 थी और वर्ष 2014 में स्कूल क्रमोन्न्त हुआ, परन्तु उसके बाद कम होती चली गई। आज आलम यह है कि इस स्कूल में हमेशा शांति फैली होती है और क्‍लासरूम में सन्‍नाटा पसरा रहता है । वहीं प्‍लेग्राउंड सूना पड़ा रहता है। जिसकी मुख्य वजह सिर्फ बच्चो का स्कूल न आना है।
यह स्‍कूल ज्‍यादा बड़ा तो नहीं है पर इस स्कूल के बिल्डिंग में छह क्लासरूम है। इस स्कूल में शिक्षा विभाग ने एक प्रधानाध्यापक और तीन शिक्षकों को नियुक्त कर रखा है, जिन्हे सरकार लाखों रुपयों की पगार देती हैं जो सुबह 8 बजे ही स्‍कूल में आ जाते हैं। स्‍टूडेंट न होने की वजह से ये टीचर दिनभर बोर होते रहते हैं। टीचर्स की सैलेरी तो टाइम पर आती है लेकिन वे अपनी जॉब से खुश नहीं हैं। शिक्षकों का कहना हैं कि वे पेड़ पौधों में पानी डालकर, झाड़ू निकालकर सरकारी कुर्सियों पर बैठकर ही वापस अपने घर चले जातें हैं । वहीं जब हम अपने घर जा रहे होते हैं तब गांव के आसपास के लोग भी स्कूल में आने वाले शिक्षकों को हीन भावना से देखकर उन पर टिप्पणियां करने से नहीं चूकते हैं ।
इस पुरे मामले के बारे में प्रधानाध्यापक सांवरमल द्वारा अपने उच्च अधिकारियों को प्रत्येक महीने रिपोर्ट भेजकर अवगत करवाया जाता है । अध्यापकों की मानें तो इस गांव की आबादी भी वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 300 के लगभग है ।

विद्यालय को शिक्षा के मंदिर के नाम से जाना जाता है। वैज्ञानिको का मानना है की संस्कृत भाषा का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति दुनिया की कोई भी भाषा बोल सकता है। संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा विभाग ने अलग से संस्कृत स्कूल तो खोल दिए लेकिन सरकार की लापरवाही की वजह से कभी इन स्कूलों में व्यवस्थाओं की कभी सुध तक नहीं ली गयी।

कांस्टेबल रामनिवास यादव पुलिसकर्मी द्वारा जयराम रैगर नामक दलित युवक के साथ मारपीट व जलती सिगरेट से दोनों हाथो की हथेलियाँ जलाई

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दिल्ली, लोकहित एक्सप्रेस, (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । आमेर थाना इलाके के नाई की थड़ी पर रहने वाले जयराम रैगर नामक दलित युवक को कांस्टेबल रामनिवास यादव पुलिसकर्मी द्वारा चोरी के झूठे केस में फ़साने का मामला व उसके साथ मारपीट कर जलती हुई सिगरेट से दोनों हाथो की हथेलियों का जलानेका मामला सामने आया है I
प्राप्त जानकारी के मुताबिक पीड़ित जयराम रैगर नामक दलित युवक ने शनिवार को कांस्टेबल रामनिवास यादव पुलिसकर्मी के खिलाफ आमेर थाने में इस मामले की रिपोर्ट दी है I उसके उपरांत पुलिस ने पीड़ित का मेडिकल भी करवाया है I
पीड़ित जयराम रैगर ने बताया कि “मैं शुक्रवार को सुबह कुकस के उपस्वास्थ्य केंद्र पर किसी से मिलने गया हुआ था कि आमेर थाने में तैनात कांस्टेबल रामनिवास यादव ने मुझे जबरन बाइक पर बैठाकर थाने ले आया, और मारपीट करने लगा तथा जबरन चोरी के मामले को कबूल करने को कहा, मेरे द्वारा नहीं कबूलने पर जलती हुई सिगरेट से दोनों हथेलियों को जला दिया I मेरी ज्यादा तबियत ख़राब होने पर मुझे छोड़ दिया गया I मेरे परिजनों ने कांस्टेबल रामनिवास यादव से मारपीट के बारे में जानकारी चाही तो कांस्टेबल रामनिवास यादव ने मेरे परिवार के लोगो को थाने में बंद करने की धमकी दे डाली” I
इस घटना के बाद दलित समाज और रैगर समाज के लोगो में पुलिस के खिलाफ रोष है I अखिल अनुसूचित जाति समन्वय परिषद् के प्रदेशाध्यक्ष नवरतन गुसाईवाल व रैगर समाज के पदाधिकारी पूरण चन्द, हीरालाल, गोपाल कृषण ने पीड़ित से मिलकर घटना की जानकारी ली और उसके बाद थाना प्रभारी से मिलकर कांस्टेबल रामनिवास यादव के खिलाफ उचित क़ानूनी करवाई की मांग की तथा केस की पूरी जानकारी ली I जानकारी देते हुए थाना प्रभारी नरेंद्र कुमार ने बताया कि ACP को घटना की जानकारी दे दी गई है वो ही इसकी जाँच करेंगे I रैगर समाज के पदाधिकारी ने कहा कि स्थानीय पुलिस द्वारा कोई करवाई नहीं होती तो हम पुलिस कमिश्नर को शिकायत करेंगे I


Monday, July 24, 2017

नारी का अपमान सालो से चला आ रहा है।

भारत देश मे नारी का अपमान सालो से चला आ रहा है। नारी को पुरूष ने हमेशा अपनी जरूरत की वस्तु के रूप मे काम मे लिया है। और सालो से नारी इस दुख को अपना भाग्य समझ कर भोग रही है। सरकार चाहे कितने भी दावें कर ले आज भी कई क्षेत्रो मे नारी को बराबर का दर्जा इस देश मे नही दिया जाता है। किसी ना किसी बंधन मे बंधी नारी आज भी लाचार और अपने आप को बेबसी की जंजीरो मे जकडी नजर आयेगी। जिस नारी को भगवान ने भी खुद से बडा दर्जा दिया आज उसी नारी की दशा देखो पहले गर्भ मे मरने का डर ,और अगर जिंदा बाहर निकली तो हवानो का डर और अगर वो उनसे भी बच गई तो दहेज लोभीयो का डर उसके मन मे बसा रहता है। एक नारी जब पुरे जग से हार जाती है तो वह अपने जीवन को जीने के लिए अकेले ही इस संसार मे जीने की कोशिश करती है। लेकिन हवानो के द्वारा उन पर अपनी तुष्ण ईच्छा के कारण अपनी हवस का शिकारी बना लिया जाता है। और इस गंदगी मे वो एक नये नाम से जानने लगती है जिसे हम वेश्या का दर्जा देते है ।कोई भी नारी अपनी स्वेच्छा से वेश्या नही बनती है समाज के दरिदे ही उसे विवश करते है और उसे वेश्या का नाम भी उनके द्वारा ही दिया होता है।  एक नारी अपने सुहाग को बचाने के लिए नाजाने कितने करवॉ चौथ करती है पर विडम्बंना देखो नारी की वो अपनी लाज नही बचा पाती है आज संसार मे वेश्या को लोग देखते तो बुरी नजरो से है। लेकिन ऑखो मे हवस भरी रहती है। कोई भी नारी अपने जीवन को इस गंदगी मे नही पलने देना चाहती है। लेकिन समाज मे फैली गंदगी व बुराई उसे इस गंदगी मे खिचं लाती है। हर एक व्यक्ति को उसके जिस्म से चाह होती है। लेकिन कोई उसकी विडम्बंना नही समझता है। और एक दिन वो पेशेवर वेश्या के नाम से जानी जाती है। जिसकी जिदंगी समाज से अलग होती है। उसके कोख से पैदा होने वाली भी इस माहौल मे अपने आप को ढाल लेती है। आज तक ना जाने कितनी बार सरकार बनी कितनी बार सरकार बिगडी किन्तु आज तक किसी सरकार ने इस मामले मे कोई ठोस कदम नही उठाये। आखिर समाज मे इनको जिने का हक क्यू नही दिया जाता है। आखिर कब तक इस दर्द के साथ उसे जिना पडेगा। सरकार या प्रशासन चाहे तो समाज मे फैली इस बुराई को खत्म कर इन्हे भी समाज के साथ चलना सिखा सकती है। जिससे आने वाली पिढी इस कलंक से मुक्ति पा सके। आज सरकार के साथ साथ समाज के हर व्यक्ति को बदलना होगा । हर व्यक्ति की आखो मे हर नारी बहन व मॉ के रूप मे होगी तब ही देश मे बदलाव सम्भव है। आज की सोच से देश के कल मे बदलाव है।

नागरिक अधिकारों पर स्पीच

मेरे प्रिय देशवासियों, शुभ संध्या:
साथियों, लगातार मिल रही धमकियों और उपेक्षापूर्ण बयानों को देखते हुए, अलबामा विश्वविद्यालय में आज दोपहर उत्तरी ज़िला अलबामा की संयुक्त राज्य ज़िला-अदालत के स्पष्ट और अंतिम आदेश के क्रियान्वयन के तहत अलबामा राष्ट्रीय सुरक्षागार्डों की तैनाती अपरिहार्य हो चुकी है. अदालत का यह आदेश दो योग्य और युवा अलबामा निवासियों के प्रवेश के पक्ष में था, जिनका जन्म संयोगवश नीग्रो परिवार में हुआ है.
विश्वविद्यालय में उनका प्रवेश जिस शांतिपूर्ण ढंग से हुआ वो अलबामा विश्वविद्यालय के छात्रों के उत्तम आचार और उत्तरदायित्व के निर्वहन की उनकी सकारात्मक सोच का द्योतक है.
मैं आशा करता हूं कि प्रत्येक अमेरिकी नागरिक, भले ही वो देश के किसी भी क्षेत्र का रहने वाला हो, एक बार ठहर कर विवेक से ऐसी घटनाओं के बारे में विचार करेगा. इस महान राष्ट्र के निर्माण में विभिन्न देशों के और विभिन्न पृष्ठभूमि से आए लोगों ने योगदान दिया है. इसका निर्माण ‘सभी लोग समान हैं’, और ‘एक व्यक्ति के अधिकारों के हनन का अर्थ है, प्रत्येक नागरिक के अधिकारों पर प्रहार’ के मूल सिद्धांत पर हुआ था.
आज हम दुनियाभर में स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत समुदायों के अधिकारों की रक्षा हेतु वचनबद्ध हैं. और अपने सैनिकों को वियतनाम या पश्चिमी बर्लिन भेजते समय केवल श्वेत अमेरिकियों को प्राथमिकता नहीं.देते. इसलिए, आवश्यकता इस बात की है कि किसी भी वर्ण के अमेरिकी छात्र बिना सुरक्षाकर्मियों की सहायता के किसी भी सार्वजनिक संस्था में प्रवेश पाने के लिए स्वतंत्र हों.
किसी भी वर्ण के अमेरिकी उपभोक्ता को बिना सड़कों पर प्रदर्शन किए होटल, रेस्त्रां, सिनेमाघर और खुदरा बिक्री केंद्रों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर समानता पर आधारित भेदभाव रहित सेवा मिले और प्रत्येक अमेरिकी नागरिक बिना किसी रंगभेद के भयमुक्त होकर चुनाव में मतदान करने के लिए स्वतंत्र हो
संक्षेप में,इस महान राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक को बिना किसी नस्ल अथवा रंगभेद के प्रत्येक वह सुविधा और लाभ मिलना चाहिए जिसका एक अमेरिकी होने के नाते वो अधिकारी है. वो अधिकारी है अपने और अपने बच्चों के प्रति उस सम्मानपूर्ण व्यवहार का, जिसकी वो समाज से अपेक्षा करता है लेकिन वस्तुस्थिति कुछ और ही है.
आज अमेरिका के किसी भी हिस्से में जन्मे श्वेत बालक की तुलना में उसी स्थान और उसी समय पर जन्मे नीग्रो बालक की हाईस्कूल उत्तीर्ण करने की संभावना आधी, कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने और नौकरी पाने की संभावना एक तिहाई, बेरोजगार रह जाने की संभावना दोगुनी, 10,000/- डॉलर प्रतिवर्ष की आमदनी की आशा श्वेत बालक की अपेक्षा एक बटा सात, औसत आयु श्वेत बालक से सात वर्ष कम और औसत आय आधी है
ये किसी स्थान विशेष का मुद्दा नहीं है. बल्कि आम नागरिकों की सुरक्षा हेतु ख़तरा उत्पन्न करने वाली असंतोष की लहर के मूल में अलगाव और भेदभाव संबंधी कठिनाईयां हमारे देश के प्रत्येक राज्य के प्रत्येक शहर में मौजूद हैं. ना ही ये कोई वैयक्तिक अथवा दल विशेष से संबंधित मुद्दा है. ऐसे आंतरिक संकट के समय हमें दलगत राजनीति से ऊपर उठकर स्वयं को संगठित करना होगा. ये केवल कोई वैधानिक मुद्दा भी नहीं है. बेहतर यही है कि बजाय सड़कों पर उतरने के, इस प्रकार के मामलों का हल अदालत के माध्यम से निकाला जाए. इसके लिए प्रत्येक स्तर पर नए कानून बनाने की आवश्यकता है, लेकिन बस कानून भर बना देने से ही किसी व्यक्ति की सोच को बदला नहीं जा सकता
मुख्य रूप से हमारे सामने मूल प्रश्न नैतिकता का.है. ये मुद्दा उतना ही पुराना है जितनी हमारी धार्मिक पुस्तक और उतना ही स्पष्ट, जितना कि हमारा संविधान.
मूल प्रश्न एक अमेरिकी नागरिक की समानता का, समान अवसरों के अधिकार का और इस बात का है, कि जो अपेक्षा हम अपने लिए करते हैं, क्या अपने साथी अमेरिकी नागरिक की ठीक वैसी अपेक्षा पर हम खरा उतरते हैं? मात्र अपनी चमड़ी के गाढ़े रंग के कारण यदि कोई अमेरिकी नागरिक आम जनता के लिए बने रेस्त्रां में खाना नहीं खा सकता, अपने बच्चों को श्रेष्ठ विद्यालयों में अच्छी शिक्षा नहीं दिला सकता, अपना जन प्रतिनिधि चुनने के लिए मतदान नहीं कर सकता यानी वह यदि उस स्वतंत्रता के साथ खुलकर नहीं जी सकता जिसकी कि हम सब अपने लिए कामना करते हैं, तो उसके जैसा रंग और उसके स्थान पर आखिर कौन होना चाहेगा! हममें से कौन है जो धैर्य और बाधाओं के ऐसे प्रतिरूप में खुद को पाकर खुश होगा?
राष्ट्रपति लिंकन द्वारा दासप्रथा को समाप्त किए जाने की ऐतिहासिक घटना को सौ से भी अधिक वर्ष बीत चुके हैं, किंतु उन दासों के वंशज, उनके पौत्र-प्रपौत्र आज भी दासता से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो पाए हैं. अन्याय के बंधनों से उन्हें आज भी पूरी तरह मुक्ति नहीं मिली है. वो आज भी सामाजिक और आर्थिक दमन के जाल में फंसे हुए हैं. अगर हमारा केवल एक नागरिक भी स्वतंत्र नहीं है तो हमारी आशाएं और राष्ट्र-स्वतंत्रता का हमारा गौरव बेमानी है.
हम संसारभर को स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाते हैं, अपने घर के भीतर उसका पालन करते हैं, किंतु संसार को और उससे भी बढ़कर स्वयं को क्या हम यही जताना चाहते हैं कि हमारे समाज में नीग्रो समाज के अलावा बाकी सभी को आज़ादी से जीने का हक है? या, हमारी इस धरती पर नीग्रो समाज के अलावा कोई भी अन्य नागरिक दूसरे दर्जे का नहीं है? या फिर, अपवादस्वरूप नीग्रो समाज को छोड़ दिया जाए तो हमारे देश में नस्ल, जाति अथवा रिहायशी बस्तियों को लेकर कोई भेदभाव नहीं है?
अब समय आ चुका है कि हम अपने वादों को पूरा करें. बर्मिंघम और अन्य स्थानों पर हुई भेदभावपूर्ण घटनाओं के विरोध में उठी आवाज़ों को अनसुना कर पाना अब किसी भी स्थानीय अथवा केंद्रीय सरकार या वैधानिक संस्था के लिए संभव नहीं है.
उत्तर से दक्षिण तक, प्रत्येक शहर में भड़क रही असंतोष और नफ़रत की आग को काबू कर पाना अब कानून के भी दायरे से बाहर होता जा रहा है. अन्याय के प्रतिकारस्वरूप अब सड़कों पर धरना-प्रदर्शन और विरोध रैलियां आयोजित की जा रही हैं, जिसके कारण देशभर में तनाव हिंसा और जानमाल की हानि का भय पैदा हो गया है.
एक राष्ट्र ही नहीं वरन एक इकाई के रूप में भी हम इस समय विकट नैतिक संकट के दौर से गुज़र रहे हैं. . इस संकट को पुलिस की सख्ती से काबू में नहीं किया जा सकता. किंतु सड़कों पर उत्तरोत्तर बढ़ते जा रहे प्रदर्शनों को नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता. प्रतीकात्मक कदम उठाकर, अथवा बातचीत के माध्यम से हालात को सामान्य बनाना भी संभव नहीं है. इसलिए अब समय आ गया है कि हम राजनैतिक अधिवेशनों में, राज्य और स्थानीय वैधानिक परिषदों में और साथ ही अपने दैनिक क्रिया-कलापों में भी समानता का सकारात्मक कदम उठाएं.
औरों पर दोषारोपण करना, या इसे एक खास तबक़े की समस्या मान लेना, या फिर परिस्थितियों पर खेद प्रकट कर देना ही समस्या का हल नहीं है. हमें आज खुद को एक शांतिपूर्ण और रचनात्मक क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए तैयार करना है.
निष्क्रिय और मूक होकर बैठे रहने से अंतत: केवल शर्मिन्दगी और हिंसा को ही बढ़ावा मिलता है. सही मायनों में सत्य और वास्तविकता को पहचानने वाले लोग ही साहसपूर्ण ढंग से स्थितियों से निपटने में सक्षम होते हैं
आने वाले सप्ताह में मैं संयुक्त राज्य अमेरिका की कांग्रेस से आग्रह करूंगा कि जो कदम इस पूरी सदी में नहीं उठाया गया, वो कदम उठाते हुए हम वादा करें कि अमेरिका के आम जन-जीवन अथवा कानून में नस्लवाद के लिए अब कोई स्थान नहीं होगा. संघीय न्यायपालिका ने भी न्यायपालिका के कर्मचारियों की नियुक्ति, न्यायिक सुविधाओं के उपयोग और न्यायपलिका द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त आवासों की बिक्री जैसे अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी विषयों में इस प्रस्ताव का समर्थन किया है .
किंतु कुछ अपरिहार्य कदम ऐसे हैं जो केवल सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं और जिनका इसी सत्र में उठाया जाना अत्यावश्यक है. समानता के अधिकार के पुराने कानून में, जो आज भी हम पर लागू है, प्रत्येक गैरकानूनी कार्य के बदले सज़ा का प्रावधान है. किंतु देश के कई हिस्सों में यदि नीग्रो समाज पर अत्याचार होता है तो हमारा यही कानून मौन हो जाता है. यदि सरकार इस दिशा में कोई पहल नहीं करती, तो इस दबे-कुचले समाज के पास सड़कों पर उतरने के अलावा और कोई चारा ही नहीं होगा.
इसलिए मैं कांग्रेस से मांग करता हूं कि वो यथाशीघ्र ऐसा कानून लाए जिसके तहत अमेरिका के प्रत्येक नागरिक को बिना किसी भेदभाव के होटल, रेस्त्रां, सिनेमाघर और खुदरा बिक्री केंद्र जैसे सभी सार्वजनिक स्थानों पर समान सेवा पाने का अधिकार हो.
मेरी दृष्टि में ये एक मूल-अधिकार है. इससे वंचित किये जाने का अर्थ है किसी का तिरस्कार करना, जो पूर्णत: अनुचित होने के बावजूद अमेरिका में आज साल 1963 में भी चलन में है.
हाल ही में प्रमुख व्यवसायियों और उनके नेताओं के साथ हुई मुलाक़ातों के दौरान मैंने उन सभी से आग्रह किया कि वे स्वेच्छा से इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाएं और मुझे अत्यंत उत्साहवर्धक प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुईं.पिछले दो सप्ताह में 75 शहरों में इन सार्वजनिक स्थलों पर भेदभाव की समाप्ति की दिशा में कदम उठाए जाने के संकेत मिलने आरंभ हो गए हैं. किंतु कई व्यवसायी ऐसे हैं जो चाहते हुए भी अकेले अपने बल पर ऐसा क्रांतिकारी कदम उठाने में हिचकिचा रहे हैं.इसलिए यदि हम इस समस्या का शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर हमें ऐसा कानून लाना ही होगा.
मैं कांग्रेस से इस बात का भी निवेदन करना चाहूंगा कि वो सार्वजनिक शिक्षा के क्षेत्र में होने वाले भेदभाव को समाप्त करने वाला कानून बनाने के लिए संघीय सरकार को प्राधिकृत करे. हम जिलास्तर पर कई क्षेत्रों में स्वैच्छिक ढंग से सामाजिक एकीकरण की दिशा में सफल हुए हैं. दर्जनों संस्थानों में नीग्रो समाज को बिना किसी हिंसा के प्रवेश मिलने लगा है. आज हमारे सभी 50 राज्यों में, सरकार समर्थित संस्थानों में आप कम से कम एक नीग्रो को तो उपस्थित पाएंगे ही, किंतु सामाजिक परिवर्तन की ये गति बहुत धीमी है.
बहुत से नीग्रो बच्चे, जिन्होंने 9 साल पहले उच्चतम न्यायालय के निर्णय के समय पृथक्कृत विद्यालयों में प्रवेश लिया था, वो इस वर्ष पृथक्कृत हाईस्कूलों में प्रवेश लेंगे, जिसके कारण होने वाली क्षति की पूर्ति कभी नहीं की जा सकेगी. पर्याप्त शिक्षा के अभाव में एक नीग्रो नागरिक को सम्मानजनक नौकरी पाने से वंचित रह जाना पड़ता है.
अत: उच्चतम न्यायालय के आदेश के क्रियान्वयन का उत्तरदायित्व पूरी तरह से उन पर नहीं छोड़ा जा सकता जो उत्पीड़न के शिकार हैं अथवा जो आर्थिक संसाधनों से वंचित होने के कारण कानूनी लड़ाई लड़ने में असमर्थ हैं.
इसके अलावा ‘मतदान का अधिकार’ को संरक्षण जैसे अन्य मुद्दों को लेकर भी निवेदन किया जाएगा. किंतु मैं एक बार फिर से दोहराना चाहूंगा कि इस समस्या का समाधान अकेली न्यायपालिका नहीं कर सकती. इसका समाधान अमेरिका के प्रत्येक समुदाय और प्रत्येक घर में खोजा जाना चाहिए.
इस संदर्भ में मैं उत्तर से दक्षिण तक उन सभी नागरिकों का अभिनंदन करना चाहूंगा, जो अपने अपने समुदायों में मानव-कल्याण के सद्कार्य में जुटे हुए हैं. वो ये कार्य कानूनी बाध्यता के कारण नहीं वरन मानवीय संवेदनाओं से वशीभूत होकर कर रहे हैं.
उदाहरण के लिए दुनिया के कई हिस्सों में जान हथेली पर लेकर स्वतंत्रता-संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहे हमारे थल व नौ-सैनिक, जिनके साहस और स्वाभिमान को मैं सलाम करता हूं.
मेरे प्रिय साथियों, ये एक ऐसी विकट समस्या है, जिसका सामना हमें उत्तर से लेकर दक्षिण तक, देश के प्रत्येक शहर में करना पड़ रहा है. आज हमारे देश में श्वेत बेरोज़गारों की तुलना में नीग्रो बेरोज़गारों की संख्या दो से तीन गुना अधिक है.पर्याप्त शिक्षा से वंचित, बड़े शहरों की ओर पलायन करते, समानता के अधिकार से वंचित, रेस्त्रां में भोजन करने अथवा सिनेमाघरों में प्रवेश के अवसरों और सम्मानजनक शिक्षा की प्राप्ति के अधिकार से और योग्य होने के बावजूद आज भी राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश से वंचित, नौकरी पाने में असफल और निराश हो चले हमारे युवा! ये वो मुद्दे हैं जिन्हें लेकर केवल राष्ट्रपति अथवा कांग्रेस के सदस्य अथवा राज्यपालों को ही नहीं बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रत्येक नागरिक को जागरुक होना है.
ये हमारा देश है. इस देश का निर्माण हम सभी के प्रयासों से हुआ है और यहां के प्रत्येक नागरिक को अपनी योग्यता के संवर्धन के अवसर प्राप्त करने का पूरा अधिकार है.
हम देश की 10 प्रतिशत जनता से यह नहीं कह सकते कि तुम्हें कोई अधिकार नहीं है कि तुम अपनी आने वाली पीढ़ियों की योग्यताओं को पहचान कर उन्हें बढ़ावा दो, या बिना सड़कों पर उतरे तुम अपने अधिकार पाने के पात्र नहीं हो. मेरा दृढ़ विश्वास है कि हम उस 10 प्रतिशत जनता के ऋणी हैं, और उस ऋणभार से मुक्त होकर हमें एक आदर्श राष्ट्र का निर्माण करना है.
अत: मैं निवेदन करता हूं कि हम सभी लोग अमेरिकी समाज को प्रतिगामी बनाने में सहायता करें, और जिस सम्मानजनक और समान व्यवहार की अपेक्षा हम अपने लिए करते हैं, वैसा ही व्यवहार हम अमेरिकी समाज के प्रत्येक बालक के साथ करें ताकि वो अपनी नैसर्गिक योग्यता के अनुरूप उच्चतम शिक्षा प्राप्त कर सके.
मैं मानता हूं कि सभी बच्चे समान रूप से क्षमतावान, योग्य, और निपुण नहीं होते, किंतु अपनी योग्यताओं के संवर्धन के लिए उन्हें समान अवसर अवश्य मिलने चाहिएं ताकि वो जीवन में खुद को साबित कर सकें.
हमें अधिकार है नीग्रो समाज से आशा करने का कि वो अपने उत्तरदायित्व को समझें, कानून का पालन करें, किंतु उन्हें भी अधिकार है इस बात की आशा करने का कि देश का कानून निष्पक्ष हो, और जैसा कि नई शताब्दी में प्रवेश के समय जस्टिस हर्लान ने कहा था, संविधान को पूरी तरह से वर्णांध होना चाहिए
यही मुद्दा आज चर्चा का विषय है और यही वह मुद्दा है जो इस राष्ट्र और इसके मूल्यों के लिए घोर चिंता का विषय बना हुआ है.इससे निपटने के लिए मुझे इस देश के सभी निवासियों का सहयोग चाहिए.

धन्यवाद.

Tuesday, July 11, 2017

राजस्थान के भीलवाडा जिले में दबंगों ने दलित ओमप्रकाश रैगर नामक व्यक्ति के शव का शमशान में अंतिम संस्कार करने से रोका

दिल्ली, लोकहित एक्सप्रेस, (रघुबीर सिंह गाड़ेगाँवलिया) । जातिवाद समाज में इस कदर जकड़ता जा रहा है कि लोग शमशान में भी जातिवाद का बीज रोप रहे है। गांव तिलोली में माली समाज के दबंगो ने दलित ओमप्रकाश रेगर नामक व्यक्ति के शव का शमशान में अंतिम संस्कार तक नहीं करने दिया। गुस्साये रेगर समाज के पीड़ित लोगों ने शव को बीच रोड पर रखकर विरोध जताते हुए चक्का जाम कर दिया । बाद में पुलिस प्रशासन एवं तहसीलदार एवं SDM साहब मौके पर पहुंचकर तुरंत प्रभाव से शमशानघाट की भूमि से अतिक्रमण हटवाकर, आसींद के C.I. राजकुमार की मौजूदगी में ओमप्रकाश के शव का अंतिम संस्कार करवाया गया ।
घटनाक्रम की प्राप्त जानकारी के मुताबिक मंगलवार 11 जुलाई 2017 को राजस्थान के जिला भीलवाड़ा, तहसील आसींद के गांव तिलोली निवासी दलित ओमप्रकाश रेगर नामक व्यक्ति की मौत हो गयी। पीड़ित परिवार के लोग शव लेकर अंतिम संस्कार करने के लिए गांव के परंपरागत श्मशान पर पहुंचे। वहां पहले से मौजूद माली समाज के दबंगों ने जमीन पर कब्जा कर रखा था। माली समाज के इन लोगों ने शमशानघाट में शव का अंतिम संस्कार करने से तो रोका ही साथ में  जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए उनके साथ बदसलूकी की, लड़ाई-झगड़े पर उतर आये। जो लकड़ियाँ वहां अंतिम संस्कार करने के लिए रखी थी उन्हें उठाकर दूर फैंक दी, पीड़ित परिवार के लोगो द्वारा बहुत मिन्नतों के बाद भी अंतिम संस्कार नहीं करने दिया गया। जबकि ये शमशान घाट ग्राम पंचायत द्वारा अलाट है ।

कोई हल नहीं निकलता देख तब पीड़ित परिवार के गुस्साये लोगो ने शव को बीच रोड पर रखकर विरोध जताते हुए चक्का जाम कर दिया । पुलिस प्रशासन के आने के बावजूद भी दबंग लोगों की दबंगाई चलती रही और शव का अंतिम संस्कार नहीं करने दिया । बाद में तहसीलदार एवं SDM साहब मौके पर पहुंचकर तुरंत प्रभाव से शमशानघाट की भूमि से अतिक्रमण हटवाकर, आसींद के C.I. राजकुमार की मौजूदगी में ओमप्रकाश के शव का अंतिम संस्कार करवाया गया । इस घटना को लेकर रैगर समाज में रोष व्याप्त है । तहसील आसींद के रैगर समाज की मांग है कि मामले की जाँच कर दोषियों के खिलाफ उचित क़ानूनी करवाई की जाय ।